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देव दोष व पितृ दोष
देव दोष : देव दोष कई कारणों से बनता है जैसे देव स्थान को तोडना, निर्माण को रोकना, किसी भी देव स्थल की भूमि को अपवित्र करना या अपने इष्ट देवता ग्राम देवता या स्थान देवता को नही मानना. जैसे इष्ट देवता जिसे हम पूर्वज इष्ट देवता के रूप में मानते है, कुल देवता जिसे हम कुल मानते है, ग्राम देवता जिसकी मान्यता पूरे गाँव में हो, स्थान देवता जिस स्थान पर वर्तमान समय में रह रहे हों. अर्थात जिन्हें हम हमारे पूर्वज मानते आये हो उन्ही की यदि अवहेलना करते है तो देव दोष माना जाता है इनकी शांति के लिए पहले तो इन्ही देवताओं का पूजन करें अन्यत्र देवदोष शांति हेतु शत चंडी पाठ महाविद्या पाठ जप अनुष्ठानों से पूजन करें अपने देवताओं को प्रस्सन करें
 
पित्र दोष : पित्र दोष मान्यता है की जो पूर्वज मृत्यु को प्राप्त होते है और अंतिम समय से उनकी कोई ख्वाहिश रह जाती है या उनके पारिवारिक सदस्यों द्वारा सेवा न करके उन्हें तंग किया जाता जाता है उनको समय - समय पर याद न किया जाता हो श्राद्ध इत्यादि न किया जाता हो तो भी पित्र दोष माना जाता है. गरुड़ पुराण में स्पस्ट लिखा है जिस माता पिता ने बचपन में बच्चे को कंधो पर बिठाया बाहों का सहारा दिया दुनिया में लाने का श्रेय प्राप्त किया यदि पुत्र अंतिम समय में अर्थी को कन्धा नहीं देता, दस दिन की क्रियाएँ नही करता, गौदान शयादान अष्ट्दान नही करते. आठ दान - तिल, लोहा, सोना, कपास ( रुई ), नमक, सात अनाज, भूमि दान गाय दान नही करते वो पित्र ऋणों से सदैव ग्रस्त रहते है. अन्य कारन गुरु की निंदा करना, ब्राह्मण का धन हड़पना, धार्मिक या पित्र कार्यों में बाधा पहुचाना ये भी पित्र दोष के कारण है. साँप को मारना इससे वंश वृद्धि के अलावा जन्म जन्मान्तर मनुष्य पित्र दोषों से ग्रस्त रहता है बिना शांति किये सफलता नही प्राप्त हो सकती.
 
शांति उपाय
यदि आकस्मिक दुर्घटना या अधिक समय तक मनुष्य रोग ग्रस्त हो या कई बार मनुष्य अकेला या घर के बाहर दुर्घटना ग्रस्त या अन्य कारणों से मृत्यु को प्राप्त हो जाता है और कई दिनों बाद पता चलता है तो वह प्राणी प्रेत योनि की और चला जाता है क्योकि दस दिन की क्रियाएँ नही होती है तो प्राणी भटकता रहता है मोक्ष को प्राप्त नही हो पता है.
 
शांति उपाय
यदि दस दिन निकल जाएँ या इससे पहले भी कुछ दिनों तक पता न चला हो या मृत शारीर न मिला हो मगर ये पक्का पता हो की मनुष्य मृत्यु को प्राप्त हो चूका है उसी दिन कुश का पुतला बनाकर शमशान घाट में जलाकर उसकी राख गंगा नदी में प्रवाहित कर दें उस दिन से क्रिया आरंभ करके नारायण बलि गरुड़ पुराण पाठ कर गायत्री जप हवन दान ब्राह्मण भोजन इत्यादि क्रियाएँ संपन्न करें और श्राद्ध तिथि भी दाह संस्कार को मानते हुए वार्षिक श्राद्ध तर्पण पंच्बली इत्यादि करें. श्रीमद्भागवत भी करें तो प्राणी मोक्ष को प्राप्त हो जाता है.
 
यदि उपरोक्त क्रियाएँ नहीं कर सके हो और कई वर्ष बाद भी पित्र दोष आ रहा हो तो क्या करें
अमावस्या को पित्रों का आवहन करें और विधि पूर्वक अन्न वस्त्र दान करें. एक बार अमावस्या को या पित्र तिथि याद हो तो तीर्थ में जाकर नारायण बलि पिंड दान करके एक चांदी की मूर्ति फूलों से सजाकर गंगा नदी में प्रवाहित करें साथ ही सवा लाख या पांच लाख गायत्री जप करवाएं. हवन ब्राह्मण भोजन दान इत्यादि करें (अधिक जानकारी हेतु +91-9871472781, 9350083571 न. पर संपर्क करें)
 
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